Friday, 16 April 2010

कामना

मैं अंधेरों को भी चीर आगे बढूँ ,
तुम किरण बन कहीं पर मिलो तो सही /
मैं तो काँटों को लूँगा हृदय से लगा ,
तुम सुमन बन कहीं पर खिलो तो सही //
तुमसे मिलने की इच्छा , बड़ी है मगर ,
मुझको प्यारी है प्रिये , विरह की डगर
फूँक डालूँगा मैं कामना का नगर ,
तुम हवन बन कहीं पर जलो तो सही//
मंजिलें मेरे आगे परेशान न हों ,
राह मेरी सफलता पे हैरान न हों ,
ना बचे लक्ष्य जो कुछ भी अनजान हो ,
साथ तुम एक कदम तक चलो तो सही //
रात धरती की गोदी में शबनम पली ,
औ' सुबह होते देखा तो लेने चली ,
एक झोंका पवन का ले ले जी मेरी ,
तुम पवन बन के झोंका चलो तो सही //

1 comment:

  1. बहुत सुंदर चित्रण किया है
    भगवान आपकी मनोकामना पूरी करे
    सुंदर कविता के लिए धन्यवाद

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